Free Online Romantic Novels Read Now Part 1&3

Free Online Romantic Novels Read Now : स्टोरी में बताया गया है, कैसे एक लड़का एक लड़की से प्यार करता है। लेकिन वह बता नहीं पता और एक लड़की एक लड़के के साथ प्यार करता है पर वह भी बता नहीं पता।  अंत में उस लड़की को कोई और प्रोपोज़ करता है और ले जा है।

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कंफेस्स करना मुश्किल था_Part 1 Online Romantic Novels

एक्साम्स के बाद की छुट्टियां शुरू हो चुकी थी। बी.टेक का 3rd Year भी ना कमाल का गुज़रा  अब हम सोच ही रहे थे की ट्रिप पे जाना है  प्लान भी हम 4 दोस्तों ने बहोत पहले से बना रखा था। 

दीप्शी मेरी क्लोसेस्ट फ्रेंड जो कॉलेज के पहले दिन से ही मुझसे जुड़ी हुयी है। ऊपर से बेहत मासूम दिखती है पर अंदर से मुझे ही पता है की क्या क्या बाटें सोचती है। 

हम दोनों एक दूसरे के सीक्रेट कीपर्स भी हैं। कोई भी बात मन में चल रही होती है बेझिझक एक दूसरे से बाँट सकते हैं। वह दर्पण को बोहोत ज़्यादा पसंद करती है। अपने ग्रुप का तीसरा मेंबर और 2 साल से उसने उसे क्रश ही बना रखा है। कहती है डसती ना टूट जाए बोल कर। 

वैसे मैं भी तोह दीपषि से अलग नहीं हु मैं भी बहन प्रग्या से कुछ बोल पाटा हूँ। हम चारो साथ रह रह के न बहोत अच्छे दोस्त बन चुके हैं। तोह बीच में कहाँ मैं प्यार की बातें लाता फिरू ?

क्लास में भी हम चारो साथ ही बैठते हैं। पर पढ़ाई में केवल दीपषि ने ही झंडे गाड़े हुए हैं। 

सारे असाइनमेंट्स , प्रोजेक्ट पता नहीं टाइम से कैसे कम्पलीट कर लेती है। पर उसी की वजह से हम भी टीचर्स की नज़रो में आगे हुए हैं। 

हम ने भी ट्रिप पे जाने का बोहोत पहले से डिसाइड किया हुआ था।  रोज़ कॉलेज जा जा के थक चुके थे। तोह ब्रेक लेना भी ज़रूरी था। 

मसूरी का प्लान बनाया और दर्पण की गाडी से हम रवाना हो गए। ड्राइव करना सिर्फ उसे ही आता था बाकी हम तोह बस गाने चेंज करने में लगे थे। 

पीछे प्रग्या थोड़ी शांत सी बैठी हुयी मन ही मन मुस्कुरा रही थी। उसी के पसंद के गाने बज रहे थे और उसपे वह अपने होठ भी हिला रही ही। 

मैं चोरी चोरी उसको एक तक देखता लेकिन उससे मेरा मन भर ही नहीं रहा था। उसे रोज़ देखता हूँ मैं पर ऐसे चोरीचोरी देखने का ना मज़ा ही कुछ कुछ और था। 

पीछे से दीपषि बार बार मेरे कानो में उसका नाम लेके चिढ़ा रही थी। और जब भी वह ऐसा करती तब मैं दर्पण को कहता , ओये दीपषि तुझसे कुछ कहना चाह रही थी। 

और दर्पण का नाम सुनते ही उसके हाव भाव बदल जाते थे। दो एक तरफ़ा बहानियाँ एक साथ चल रही है पर उससे सभी अनजान थे। 

हम बातें करते करते यादें बुनते बुनते सफर का पूरा लुफ्त उठा रहे थे। हवा भी काफी तेज़्ज़ चल रही थी। और उस हवा के संग मानो हम भी बहे जा रहे थे। 

दोस्तों के साथ घूमने जाने का मज़ा ही कुछ अलग होता है ना। साड़ी दुनिया , परेशानियों को पीछे छोड़ कर यह ब्रेक लेना भी कितना ज़रूरी होता है ना। 

अभी दिमाग बिलकुल खली था और चेहरे पे असली वाली मुस्कराहट थी। कल क्या हुआ था आगे क्या होगा? अभी किसी चीज़ की कोई टेंशन ही नहीं थी। 

यह 3-4 दिनों का वक़्त सिर्फ हमारा होने वाला है। सुबह उठते ही मुझे प्रग्या का चेहरा दिखेगा। सब कुछ एक ख्वाब सा होने वाला है। 

कुछ घंटो के बाद जहाँ पोहोचना था हमें हम पोहोच गए। क्वीन ऑफ़ हिल्स – मसूरी , यह पहाड़ तोह मानो सीधा जाके सूरज को ही छूं रहे थे। 

हलकी हलकी सी ठंडी हवा ,बिलकुल साफ़ नीला सा आसमान ,खुशनुमा सा मौसम था। एक खुलापन सा था यहाँ।  टेड़े मेढे से रास्ते जिनपे घुमते घुमते हम आये थे। मैं कवी होता ना तोह यहाँ बैठ कर पूरी किताब लिख सकता था। 

हम में से कोई कुछ बोल ही नहीं रहा था अभी फिलहाल इन् पहाड़ो को ही देख रहे थे नॉएडा से यहाँ तक 6-7 घंटे के ट्रेवल से हमें थक जाना चाहिए था ना पर एक्ससिटेमेंट के मारे  हम थके ही नहीं थे। 

हम काफी उचाई पे थे और उससे भी पहाड़ अभी हमारा इंतज़ार कर रहे थे। हम ने आगे बढ़ना शुरू किया ख़ुशी की बात और यह थी की दीपषि और दर्पण और मैं और प्रग्या हाथ पकड़ के साथ चल रहे थे। 

प्रग्या को मैं पिछले एक साल से जानता हूँ। जब बैच शफल हुए थे और वह हमारे बैच में आयी थी। दर्पण और दीपषि के वह काफी क्लोज है। मेरी तोह उससे पहले ज़्यादा बात भी नहीं होती थी। 

लेकिन एक दिन ट्रुथ & डेअर खेलते टाइम उसे एक  डेअर मिला की क्लास में जो उसे सबसे अच्छा लड़का लगता है ना उसे हग करके आना है एंड गेस व्हाट ? उसने मुझे हग किया पूरी क्लास के सामने और तब से ही हम क्लोज भी हो गए।  और मैंने भी सोच लिया की अब तोह रोज़ कॉलेज आना है 

अपने ग्रुप में सबसे कूल तोह वैसे दर्पसन है। उसकी पर्सनालिटी उसके नाम से वैसे मैच नहीं करती। नाम तोह सही में थोड़ा ओल्ड फैशन है। 

पर किसी चीज़ की कभी कोई टेंशन ही नहीं लेता। एक्साम्स में फ़ैल भी हो जाए तोह हस्ते रहता है और हमेशा पता नहीं हर लुक में अच्छा कैसे दिख सकता है वह। बिना नहाये भी आये तोह पूरे दिन फ्रेश लगता है। 

कभी कभी मुझे जलन होती है उससे आज भी प्रग्या ने उसकी तारीफ करि पहले मुझसे और दीपषि को तोह उसने पहली नज़र से ही दीवाना बना रखा है। उसकी तोह एक पल भी नज़र नहीं हठती है उससे। 

हम थोड़ी दूर चले तोह एक बोहोत अच्छा सा व्यू सामने नज़र आ रहा था हम ने रुक कर बड़ी साड़ी फोटोज ली और क्या बताऊँ तब वहां कितना मज़ा आ रहा था। 

हम होटल गए और पहले 2 रूम्स बुक कर लिए। सामान कमरे में रखा थोड़ा फ्रेश हो कर फिर बहार चल दिए 

अब भूख लगना शुरू हो चुकी थी तोह खाना भी भर पेट खाया। मैं प्रग्या के साथ ही बैठा था पर उससे ज़्यादा बात मैं कर नहीं पाया। 

सफर की थकान अब हम्मारी आँखों में दिखने लगी थी। हम वापस होटल पोहोचे एक रूम में बैठे और ठण्ड भी बढ़ने लगी थी। 

स्पीकर में गाने बज रहे थे और हम सब भी कुछ न कुछ बाटें कर रहे थे।  हम ने लूडो खेला, UNO खेला। नींद आ रही थी पर हम लोग पता नहीं सो ही नहीं रहे थे। 

हस्स रहे थे गा रहे थे पागलो की तरह। फिर मैंऔर दर्पण दूसरे रूम में चल दिए जब लेट होने लगा। 

बीच रात में फिर मेरी नींद खुली 1 बज रहे थे। उसके बाद सोने की कोशिश करि तोह  3-4 मच्चर सोने ही नहीं दे रहे थे। 

अब नींद टूट ही गयी थी तोह मैंने सोचा थोड़ा बालकोनी में  जा कर। रात का नज़ारा ही देख लिया जाए। मैं निकला बहार तोह मैंने देखा प्रज्ञा भी वहीँ बैठी हुयी है। उदास सी एक सोच में डूबी हुए कुछ अंदर ही अंदर बोलती जाए 

वह इतनी खोयी हुयी थी की उसे यह भी एहसास नहीं हुआ की मैं भी वहां मौजूद हूँ। फिर मैंने ही सामने से पूछा ,  ओये प्रग्या मेरी तरह तुझे भी नींद नहीं आ रही है क्या। यहाँ ऐसे क्यों बैठी है तू ? 

और मेरी आवाज़ सुनते ही वह रो पड़ी मानो कब से इस इंतज़ार में हो की कोई आके बस हाल पूछ ले उससे। मैंने उसके पास गया और बोला, अरे रो क्यों रही है ? अभी तक तो सब ठीक ही था न वैसे ?

उसने रोते रोते ही कहा की यार मुझे पापा की बोहोत याद आ रही है। आज उनका बर्थडे है और कितना अजीब है ना वह मेरे साथ ही नहीं है। 

अब तोह ४ साल हुए हैं उन्हें दुनिया से गए हुए। लेकिन आज भी उनकी उतनी ही याद आती है। बोहोत प्यार करते थे मुझसे मैं बोहोत कोशिश करती हूँ खुद को सँभालने की पर कभी कभी बोहोत ज़्यादा याद आने लग जाती है 

उसने फ़ोन खोला और कुछ पुरानी फोटोज दिखाने लगी। उन्हें देख देख कर वह रोते हुए भी थोड़ा सा मुस्कुराने लगी। 

वह हर पुरानी याद मुझे ऐसे बता रही थी जैसे उन्हें जी रही हो अभी। मैं उसकी बातों को इतनी प्यार से सुन रहा था और उसे रोता देख मेरी भी आँखें भरने लगी। 

फिर हम ने बोहोत सी बातें की वह बातें गहरी से गहरी होती गयी। हम सवालों से जवाबो से घिरे हुए थे। मेरी प्रग्या के साथ यह आज तक की लांगेस्ट कन्वर्सेशन थी। 

मुझे पहली बार यह अहसास हुआ की मैं भी इतनी अच्छी अच्छी बातें कर सकता हूँ। दुसरो को कंसोल कर सकता हूँ। दुसरो को मोटीवेट भी कर सकता हूँ। 

हम आसमान के नीचे बैठे सितारों को देख रहे थे।  अचानक ही बीच बात में उसने पूछा मुझसे हम हग कर सकते हैं क्या ? मैंने उसकी तरफ देखा और थोड़ी देर तक देखता रहा फिर बिना कुछ कहे मैंने हाथ आगे किया और उसके गले से लग गया। 

मैं समझ रहा था उसकी कंडीशन उसे ज़रुरत थी एक साथ की। चाँद भी आज थोड़ा ज़्यादा बड़ा लग रहा था ,एक अलग बात थी इस रात की 

मुझे एक ही पल में बोहोत कुछ महसूस हुआ। एक झटके में ही मैं उससे इतना कैसे क्लोज हुआ ? टाइम देखा घडी में तोह 3. 30 बज चुके थे। हम दोनों मुस्कुराये एक दुसरे को देख के फिर सोने को चल दिए। 

मैं बिस्तर पे पड़े पड़े सोयु कैसे यह गुज़रा मोमेंट आँखों के सामने से हट ही नहीं रहा था। इतना अच्छा सा लग रहा था न सब सोच कर ,उससे गले मिलना मुझे बार बार याद आ रहा था। 

कंफेस्स करना मुश्किल था_Part 1 Online Romantic Novels

फिर यादों में ही पता नहीं चला की कब आँखें भी लग गयी। दर्पण नाहा धो के मुझे जगाने आया ,बोलै उठ जा सुबह हो गयी। 

आज केम्पटी फाल्स और गन हिल्स को हम ने एक्स्प्लोर किया। सुकून का पर्याय क्या होता है यह आज हम ने महसूस किया। 

सुबह से प्रग्या से भी मेरी ज़्यादा बात नहीं हुयी। वह दर्पण के साथ ही थोड़ा ज़्यादा इन्वॉल्व थी। 

और मुझे भी कल रात की बात दीपषि को बतानी थी। मैं किसी से कुछ ना कहु पर उससे नहीं छुपा सकता कुछ भी। 

वह मुझे A to Z  पूरा जानती यही। वह मेरी हसी के पीछे का कारण भी पहचान लेती है। ऐसी दोस्ती इससे पहले मेरी किसी से नहीं हुयी। मैं अभी भी सोचता हूँ की मेरी क़िस्मत इतनी अच्छी कैसे हो गयी। 

मैंने दीपषि को कल रात का पूरा सीन बताया। कैसे प्रग्या से मेरी घ्यानतो बातें हुयी और एन्ड में उसे गले भी लगाया। 

दर्पण और प्रज्ञा तब से दूसरी साइड हज़ार फोटोज ले चुके होंगे। मैं और दीपषि कब से यहाँ बातों में ही लगे थे। 

उसने हस्ते हुए मुझसे कहा वाह यार ,काश मेरा और दर्पण का भी ऐसा मोमेंट बनता। इतनी शान्ति की तुम्हे तोह एक दूसरे की सांस तक की आवाज़ आ रही होंगे। सब कितना रोमांटिक लग रहा होगा ना। 

पर तुझे नहीं लगता की तुझे प्रग्या को एक इशारा दे देना चाहिए था। मतलब दिल की बात रख देनी चाहिए थी सामने ऐसे मोमेंट बार बार थोड़ी ना आएगा। वह वल्नरेबल टाइम था। तीर लग भी सकता था निशाने पर। 

इतने दिनों से वेट कार रहा है ना। तेरी दिल की बात उसको मालूम होनी चाहिए। मैं तोह फट्टू हूँ मेरी दर्पण को देखते ही हालत खराब हो जाती है। पर आभाष तुझे तोह एटलीस्ट बोल देना चाहिए। 

मैंने कहा मेरी हिम्मत नहीं होती। सब कह देने से कहीं गड़बड़ ना हो जाए। अपना इतना अच्छा चारो का ग्रुप है पूरा। मेरी वजह से कोई आंच ना आ जाए। 

पर एक काम कर सकते हैं। मैं एक शर्त पे प्रग्य को सब कुछ बता दूंगा। और शर्त यह है की पहले तुझे दर्पण को कंफेस्स करना पड़ेगा। तू दर्पण को अपने दिल की बात बता देगी ना। तोह में भी  बेझिझक  प्रग्या  के सामने दिल रख दूंगा। 

वह सोच में पढ़ गयी। मुझसे झगड़ने भी लगी। कहने लगी यह नहीं हो पायेगा। फिर बोहोत विचार करने के बाद उसने हिम्मत करके बोला ,चल ठीक है जो भी होगा देखा जायेगा। 

पर यहाँ से जाने के बाद ही सोचेंगे। क्यूंकि ट्रिप का माहौल ख़राब नहीं कर सकते। अब भूख भी लगने लगी थी। तोह मैंने ही पूछा की चल थोड़ा कुछ खाने चले। 

हम ने दर्पण और प्रग्या को आवाज़ दे कर बुलाया। जो हाथो में हाथ दाल के हर तरफ घूमे जा रहे थे। हम  खाना खाने के लिए बैठे और आगे क्या करना है उसका भी सोचे जा रहे थे। 

मेरी साइड में दर्पण बैठा था और अभी जो उसने फोटोज खींची थी वह मुझे एक एक करके दिखा रहा था। ओये प्रग्या कितनी क्यूट लगती है ना। देख यह फोटोज कितनी अच्छी आयी है। सिर्फ प्रग्या के तारीफों के पुल्ल बांधे  जा रहा था। 

फिर दूसरी तरफ से दीपषि ने भी हमें ज्वाइन किया और वह भी फोटोज देखने लगी फिर वहां से हम खाना खा कर निकले जब शाम होने लगी 

हम रूम पे पोहोचे बैठे थोड़ा लेकिन मुझे अब नींद आने लगी थी और आये भी क्यों ना पिछली रात जो नींद पूरी नहीं हुयी थी। 

 पर यह दर्पण को आज पता नहीं क्या हो गया था। उलटे सीधे सवाल पूछ पूछ के उसने दिमाग खराब कर रहा था। मैंने उसकी बातों पे ध्यान भी नहीं दिया और बस हाँ हाँ करके उसका जवाब देता गया। 

कल हमारा आखिरी दिन होगा मसूरी में। मैं भी कल के बारे में सोचते सोचते बस सो गया। इस आखिरी दिन फिर हम ने और नयी जगहों पे  कदम रखे. दर्पण और प्रग्या को तोह फोटोज लेने की फुर्सत नहीं थी। 

मुझे तोह फोटोज का ज़्यादा शौक ही नहीं है। क्या करे मेरी पिक्स अच्छी आती ही नहीं यही। फोटो के मामले में मैं चांडलर जैसा ही हूँ। कैमरा खुलते ही मेरे चेहरे को पता नहीं क्या हो जाता है। और लोग तोह पता नहीं इतने पोसेस कैसे दे देते हैं। मुझे तोह ढंग से हसना भी नहीं आता है। 

मैं और दीपषि चाय लेने के लिए एक दूकान पे खड़े थे। वहीँ दर्पण और प्रग्या पहाड़ के किनारे पे बैठ के हमारा इंतज़ार कर रहे थे। 

खुला आसमान ठंडी हवा हसीन नज़ारा और दोस्तों के साथ एक गरम चाय इससे बेहतर कुछ हो सकता है ? पर इस दूकान पे इतनी भीड़ थी की बोहोत ज़्यादा टाइम लग रहा था। हमारा नंबर आने में। तोह उस मोमेंट का वेट करना ही एक ऑप्शन बनता है। 

मैं और दीपषि भी तब पागलो की तरह तब इस बात पे लड़ रहे थे की मेरी और प्रज्ञा की जोड़ी ज़्यादा अच्छी लगेगी या उसकी और दर्पण की। वहां वह दोनों बैठे हमारा कब से इंतज़ार कर रहे होंगे। पर उस बात की अब हमें कोई फ़िक्र ही नहीं। 

फिर बोहोत देर के बाद हम दोनों चाय लेकर उनके पास पोहोचे। सिर्फ प्रग्या अकेली वहां बैठी हुयी थी शांत कुछ सोचती हुयी। 

हम गए उसके पास और हमने पूछा दर्पण कहाँ है। उसने कुछ देर बाद जवाब दिया की वह तुम्हे देखने गया था की तुम्हे इतनी देर क्यों हो रही थी। 

मैंने दर्पण को फ़ोन करके बुला लिया। और प्रग्या से पूछा क्या हुआ ?तू इतनी चुप चुप क्यों है ?वहां से फिर दीपषि ने भी कहा ,हाँ यार जब हम गए थे तब तोह खिली हुयी सी थी। फिर ऐसी घूमसूम सी क्यों है ?

उसने कहा मुझे कुछ नहीं हुआ है। मैं तोह बस जो दर्पण से अभी मेरी बात हुयी बस उसे दोहरा रही थी। उसने शरमाते हुए हमारी तरफ देखा और कहा दर्पण ने मुझे प्रोपोज़ किया है। और तुम्हारे सामने मैं क्या बोलू ,बात ही मुझे समझ नहीं आ रही थी। 

हम इतने दिनों से साथ में हैं। एक दुसरे को अच्छे से जानते हैं। तोह मैंने भी हाँ कर दिया।  तुम दोनों ने ऐसी शकल क्यों बना राखी है। मैंने ठीक किया ना ?

दीपषि और मैंने एक दुसरे की तरफ शॉकिंग नज़र से देखा। दो दिल एक साथ टूट रहे थे पर चेहरे पे हमने दिखने नहीं दिया। 

जहाँ मेरी प्रग्या और दीपषि दर्पण की जोड़ी की बात चल रही थी। वहां दर्पण और प्रग्या का सेट बन गया। हम ने अपना प्रपोजल पोस्टपोन किया था।, की ट्रिप का माहौल खराब ना हूँ। पर यहाँ तोह अंदर का ही माहौल बर्बाद हो गया। 

पर यह अचानक हुआ कैसे हमें भनक भी नहीं थी। लेकिन अब समझ आ रहा था की दर्पण के मुँह से प्रग्या के लिए इतनी बातें क्यों निकल रही थी। 

वहां प्रग्या सारी कहानी खुश हो के सुना रही थी। दीपषि  और मैं सुध बुध खोये बस एहि सोचे जा रहे थे की अचानक यह कैसे हुआ। 

मैं दीपषि का दर्द समझ सकता था और वह मेरा क्यूंकि हम दोनों अभी एक ही हाल से गुज़र रहे थे। चाय भी ठंडी होने को आया पर उसे हम घोटते कैसे पहले यह हालात ही समझने की कोशिश कर रहे थे। 

वहीँ से भागता भागता  दर्पण आया और प्रग्या के साथ बैठ गया। हम फ्रेंड्स से कपल हो गए हैं अब उसने हस्ते हस्ते हम से कहा। 

दीपषि और मैं कुछ बोलते नहीं तोह अजीब लगता ,तोह हम ने भी एक्ससिटेड हो कर अपनी ख़ुशी जाता दी। दीपषि तोह लग रहा था रो ही देगी पर कैसे भी कर के तब सिचुएशन संभल ली। 

तभी दर्पण ने कहा अरे यह चाय तोह पूरी ठंडी हो गयी हम दूसरी ले कर आते हैं चल प्रग्या। फिर वह और प्रग्या चले गए। 

मैंने और दीपषि ने एक दुसरे से कुछ नहीं कहा बस हम दोनों एक दुसरे की भरी हुयी आंखे  देख रहे थे। अब क्या कर सकते थे हम ? कुछ नहीं ,तोह मुस्कुरा दिया। सोचा कुछ और ही था पर जो होना था वह तोह हो गया। 

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